कर्मनाशा/ Negative Feedback

मान्यता है कि नदी में स्नान करने से मनुष्य के सारे पाप धुल जाते हैं लेकिन कर्मनाशा नदी में स्नान करने से मनुष्य के सारे पुण्य धुल जाते हैं अर्थात पुण्य समाप्त हो जाते हैं| ये तो उल्टा ही हो गया| नदी स्नान से सारे पाप धुलने के बजाय सारे पुण्य ही धुल जाते हैं|

ऐसा क्यों ?

इसके लिए त्रिशंकु के पास चलना होगा|

प्रतापी किन्तु दुष्ट स्वभाव के सूर्यवंशी  राजा त्रिशंकु के संबंध में श्रीमद् भागवत (नवम स्कंध, अध्याय 7 ) और वाल्मीकि रामायण (बाल कांड ) में उल्लेख आया है। त्रिशंकु का वास्तविक नाम सत्यव्रत था।ब्राह्मण की पत्नी का अपहरण, पिता की आज्ञा न मानने और गोहत्या, इन तीन पापों के कारण वह त्रिशंकु कहलाया।

सदेह स्वर्ग जाने की लालसा लेकर त्रिशंकु ऋषि वशिष्ठ के पास पहुंचा| उन्होंने यह कहते हुए मना कर दिया कि सदेह स्वर्ग में नहीं जाया जा सकता| 

उन्होंने जब मना कर दिया तो वह ऋषि विश्वामित्र के पास पहुंचा| ऋषि विश्वामित्र ने कहा, क्यों नहीं जा सकते| मैं भेजूंगा तुम्हे सदेह स्वर्ग| अपने महातप के बल से उन्होंने उसे सदेह स्वर्ग भेजा|

देवराज इन्द्र ने उसे स्वर्ग से वापस पृथ्वी की ओर धकेल दिया। नीचे गिरते हुये त्रिशंकु को ऋषि विश्वामित्र ने बीच में ही लटका कर अपने महान तपोबल से दक्षिण दिशा में उसके लिये नव सृष्टि की रचना की|उन्होंने अनेक नक्षत्रों तथा सप्तऋषियों की रचना कर डाली| स्वर्ग का निर्माण किया|

कहते हैं, त्रिशंकु अपने उसी स्वर्ग के साथ आज भी वास्तविक स्वर्ग और पृथ्वी के बीच उल्टा लटका हुआ है। उसके मुख से जो लार टपका उसी लार से कर्मनाशा नदी का निर्माण हुआ|

अपने दुष्ट स्वभाव, कुत्सित चरित्र, दुर्व्यवहार की वजह से सत्यव्रत त्रिशंकु बन गया|

स्वयं के पुरुषार्थ से नहीं,स्वयं के द्वारा किये गए कार्यों से नहीं किसी और के किये गए  पुरुषार्थ और कर्म से मनोबांछित फल को प्राप्त करना चाहा|

अपने अहं की तुष्टि और उसके लोभ ने उसे वास्तविक स्वर्ग और पृथ्वी के बीच उल्टा लटकाया|

अहं, कुत्सित चरित्र और लोभ की लार से जिस नदी का निर्माण होगा वह नदी कर्मनाशा ही तो कही जाएगी और उस नदी में स्नान करने से सारे पुण्य तो धुलेंगे ही न|

इस कहानी से जीवनोपयोगी एक महत्वपूर्ण सूत्र भी पकड़ में आया और वह यह कि जीवन में आपको न कहने वाले आपके सच्चे हितैषी हो सकते हैं| वशिष्ठ जानते थे की सदेह स्वर्ग नहीं जाया जा सकता इसलिए उन्होंने ईमानदारी से त्रिशंकु को उसकी जानकारी देते हुए न कह दिया| इसलिए जब भी कहीं से Negative Feedback मिले तो हतोत्साहित होने की बजाय उसके पीछे के कारणों का धैर्य पूर्वक विवेचन हमें त्रिशंकु की तरह न घर का न घाट का बनने से रोक लेगा|